राजनीति और हमारा संसार
बीजेपी के पूर्वज जनसंघ की स्थापना यद्यपि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की, पर संघ के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर। व्यवहार में यह संघ की राजनीतिक धारा के रूप में ही खड़ी हुई। मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय दोनों का जनसंघ की स्थापना के समय से लेकर आगे तक बराबरी का कद था। जनसंघ की स्थापना के विचार को लेकर मुखर्जी उस समय संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर के पास आए थे। लंबे विमर्श के बाद खासकर तब के प्रचार प्रमुख बाबा आप्टे की सलाह पर गुरु गोलवलकर ने हरी झंडी दी और संघ से भारी संख्या में कार्यकर्ता जनसंघ में भेजे गए। उनमें से कई नेता आज भी जीवित हैं। जब 1980 में जनता पार्टी का विघटन हुआ तो उसमें भी संघ मूल कारण बना। जनता पार्टी के समाजवादी घटक के कुछ नेताओं ने प्रश्न उठाया कि संघ और पार्टी दोनों की सदस्यता साथ नहीं चल सकती।
जनसंघ घटक के नेताओं ने संघ के साथ अविच्छिन्न संबंध का तर्क देते हुए बीजेपी का गठन किया। इस प्रकार जनसंघ एवं बीजेपी दोनों के गठन के पीछे संघ ही था। इस पृष्ठभूमि में कहा जा सकता है कि जब बीजेपी है ही संघ की पैदाइश तो सार्वजनिक रूप से उसकी सरकार की रक्षा करने या उसके साथ दिखने में समस्या नहीं होनी चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि संघ राजनीति को लेकर बिल्कुल अलग राय रखता रहा है। राजनीति और सत्ता से संबंधित संघ नेताओं के जितने भाषण आप देख लीजिए, सबमें एक ही सूत्र है कि समाज सत्ता से संचालित नहीं होना चाहिए, सत्ता समाज से संचालित हो। यदि समाज अपने विकास के लिए सत्ता पर निर्भर हो गया तो वह उसी ढंग से नष्ट हो जाएगा जैसे पेड़ गिरने पर उससे लिपटी हुई लताएं।
लेकिन वर्तमान परिदृश्य कुछ और कहता है। संघ विरोधियों को तो छोड़िए, कोई आम नागरिक स्वीकार करेगा कि संघ राजनीति के बारे में ऐसे निस्पृह विचार रखता है? आज संघ पर हमले सबसे ज्यादा राजनीति के कारण होते हैं। बीजेपी में संघ का हस्तक्षेप पहले भी रहा है। संघ राजनीति को काजल की कोठरी कहता रहा है। तो उस कोठरी की कालिख उसके ऊपर भी लगेगी और जो उसका दूरगामी लक्ष्य था, कार्यकर्ता निर्माण कर राष्ट्र के हर क्षेत्र में मानक स्थापित करने के लिए छोड़ देना, वह भयावह रूप से दुष्प्रभावित होगा। सेवा के नाम पर राजनीति में आने वालों की संख्या सभी दलों में कम हुईं है। ऐसे लोग बीजेपी में संघ के नाम का कई प्रकार से दुरुपयोग करते हैं। संघ से संबंध रखने वाले ऐसे व्यक्तियों की पहचान बन गई है जो संघ की गतिविधियों के हिस्सा न हों, पर सत्ता से उनका संबंध है, उस नाते मीडिया से भी रिश्ता है और वो उसी तरह बयान देते हैं जैसे राजनीतिक पार्टियों के नेता।

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